दोहे - राधा और कृष्ण

 कृष्ण
रोम रोम है कह रहा छोड़ जगत के काम
बुला रहा है साँवरा चल वृन्दावन धाम
 
दुनिया कैसी बावरी कान्हा कों भरमाय
लडुआ वाय दिखाय कें खुद्द हड़प कर जाय

भजन कीर्तन - मुरली सुना के श्याम ने मस्ताना कर दिया

 मुरली सुना के श्याम ने मस्ताना कर दिया
ऐसे नजर मिलाई कि दीवाना कर दिया
 
दिल की ये आरजू थी कि दिल में वही रहे
अपना बना के औरों से बेगाना कर दिया

भजन कीर्तन - घरबार भी तुम्हीं हो दरबार भी तुम्हीं हो

 मिसरी की डलियों को कुतरा नहीं जाता है
रस चख तो सकते हैं खाया नहीं जाता हैं
इस खातिर ही तो हम तुझे ढूँढते रहते हैं
हासिल में तलब का मज़ा पाया नहीं जाता है

भजन कीर्तन और सवैया छन्द - उसका ही आसरा था उसका ही आसरा है

उसका ही आसरा था उसका ही आसरा है
सबकुछ मेरे लिए तो नँदलाल साँवरा है

भजन कीर्तन - कहें कैसें लागै पियारी महौब्बत

 कहें कैसें लागै पियारी महौब्बत
पजारौ करै है पजारी महौब्बत
 
तेरे संग लागत हुती फूल जैसी
तिहारे बिना है कटारी महौब्बत

भजन कीर्तन और कवित्त - कहीं नजर न लग जाये, मेरा श्याम है मस्ताना

 क्या रूप सलोना है जग जिसका है है दीवाना ।
कहीं नजर  लग जायेमेरा श्याम है मस्ताना ॥

भजन कीर्तन - प्राणों से प्यारे आँखों के तारे तुम्हीं तो हो

 प्राणों से प्यारे आँखों के तारे तुम्हीं तो हो ।
अम्बर में जगमगाते सितारे तुम्हीं तो हो ।
राजाओं के भी राज-दुलारे तुम्हीं तो हो ।
हम हैं तुम्हारे और हमारे तुम्हीं तो हो ।।

भजन कीर्तन - जिसके मस्तक ब्रज धूलि लगी

जिसके मस्तक ब्रज धूलि लगी
वो आना जाना क्या जाने
जिसके मन में घनश्याम बसें
वो और ठिकाना क्या जाने

भजन कीर्तन - क्यों तेरी सौगन्ध खाएँ साँवरे

 दुनिया में मशहूर हैजिन अँखियों का नूर ।
हम को भी उनका नशाहो ही गया हुज़ूर ॥
 
प्रीत-चुनरिया में कहाँलगते हैं पैबन्द ।
हम सच्चे दिलदार हैंक्यों खाएँ सौगन्ध ॥
 
क्यों तेरी सौगन्ध खाएँ साँवरे ।
चीर कर दिल क्यों दिखाएँ साँवरे ।
तेरी मरजी मान या मत मान रे ॥

भजन कीर्तन - बड़ी मिठास भरे रस को पी के आया हूँ

 बड़ी मिठास भरे रस को पी के आया हूँ ।
नज़र में भर के दरस लाडली के आया हूँ ।।
 
गया था मैं भी वहाँ ज्ञान का वमन करने ।
मुहब्बतों के समझ कर सलीक़े आया हूँ ॥

भजन कीर्तन - भले ही चोर है लेकिन सखा सभी का है

 भले ही चोर है लेकिन सखा सभी का है ।
अरे हुजूर उसे पहचानो वो कन्हैया है ।।
 
हरेक तत्व में अस्तित्व उसका है लेकिन ।
वो कुंज-गलियों में रहना पसन्द करता है ।।

भजन कीर्तन - साँवरे सलोने नन्दलाल तेरी गाय हैं

 साँवरे सलोने नन्दलाल तेरी गाय हैं ।
हम तो सीधीसादी हे गोपाल तेरी गाय हैं ।।
 
एक बार तो गोपाल बाँसुरी सुना हमें ।
धुन सुना के कर हमें निहाल तेरी गाय हैं ।।

भजन कीर्तन - जिसे मालूम हो मुझको बताये कौन ऐसा है

जिसे मालूम हो मुझको बताये कौन ऐसा है ।
मेरा मुरली मनोहर साँवरा नँदलाल जैसा है ।।
 
जिसे भी छू लिया इसने उसे कुन्दन बना डाला ।
मेरा मुरली मनोहर साँवरा पारस के जैसा है ।।

भजन कीर्तन - उन्हीं के भक्त हैं उनके गुणों का गान करते हैं

 उन्हीं के भक्त हैं उनके गुणों का गान करते हैं
उन्हीं के गीत गाते हैं उन्हीं का ध्यान करते हैं
 
बिना सोचे बिना समझे भलाई कौन करता है
बिना सोचे बिना समझे भला भगवान करते हैं

भजन कीर्तन - अपना लो हमें श्री राम तुम्हारे दर पे आये हैं

 दर पे आये हैं तुमहारे दर पे आये हैं
अपना लो हमें श्री राम तुम्हारे दर पे आये हैं
दर पे आये हैं तुमहारे दर पे आये हैं
हमें और नहीं कोई काम तुम्हारे दर पे आये हैं

कोई जोगन बगैर साजन के

 कोई जोगन बगैर साजन के,
शम्म की तर्ह जल रही होगी ।
यह तो लोबान जैसी खुशबू है,
कोई मीरा पिघल रही होगी ॥

भजन कीर्तन - कन्हैया बारम्बार प्रणाम कन्हैया बारम्बार प्रणाम

कंकर-कंकर, अक्षर-अक्षर, हर नाम तुम्हारा नाम
कन्हैया बारम्बार प्रणाम कन्हैया बारम्बार प्रणाम

भजन कीर्तन - नैंक बेसुध से हैं नैंक बेहाल हैं

 नैंक बेसुध से हैं नैंक बेहाल हैं
लाडले लाडली लाज सों लाल हैं

भजन कीर्तन - प्रेम के रस में डूबौ रसागार है

 प्रेम के रस में डूबौ रसागार है
रस निकुंज में राधे कौ दरबार है
देह के गेह में नेह के मेह सौ
प्राण प्यारौ ही बस प्राण आधार है

भजन कीर्तन - कृष्ण जन्माष्टमी की भेंट

 

दोहा 1

 

कृष्ण जन्म के पर्व पर, यमुना ललित ललाम ।

राधे से मिलने चलीं, श्री बरसाने धाम ।।

 

दोहा 2

 

सब सब के आधीन हैं, फिर भी भेद महीन ।

कोई जल बिनु मीन है, कोई जल, बिनु मीन ।।

बढा रही हैं रंगतें हुजूर के दयार की

 बढा रही हैं रंगतें हुजूर के दयार की ।
उमंग में तरंग घोलती धुनें धमार की ॥
 
निकुंज के सनेहियों को और चाहिये भी क्या ।
वही किशन की बाँसुरी वही धुनें धमार की ॥

भजन कीर्तन - कितनी बार बताएँ तुमको कैसा लगता है

 कितनी बार बताएँ तुमको कैसा लगता है ।
मुरलीवाला प्यारा है तो प्यारा लगता है ।।
 
परसों में अब भी दो दिन हैं आ जायेगा वो ।
हमें तो उसका झूठा वादा सच्चा लगता है ।।

भजन कीर्तन - गर अपना समझते हो तो यूँ नखरे दिखाओ मत

 अगर अपना समझते हो तो यूँ नखरे दिखाओ मत
ये कलियुग है इसे द्वापर समझ कर भाव खाओ मत
 
भले ही फोड़ दो मटुकी भले ही लूट लो माखन
मगर प्राणों से प्यारे तुम हमारा दिल दुखाओ मत

भजन कीर्तन - हमारा बन के हम में ख़ुद समा जाने को आतुर हैं

 हमारा बन के हम में ख़ुद समा जाने को आतुर हैं।
हृदय के द्वार खुल जाओ - किशन आने को आतुर हैं॥
 
अगर हम बन सकें राधा तो अपने प्रेम का अमरित।
किशन राधा के बरसाने में बरसाने को आतुर हैं॥

भजन कीर्तन - नन्द जू के लला धन्य हो गए हैं हम

 नन्द जू के लला धन्य हो गए हैं हम ।
तुझको मन में बसा धन्य हो गए हैं हम ।।
 
अबसे पहले हॄदय इतना पुलकित न था ।
जबसे तू है मिला धन्य हो गए हैं हम ।।

छन्द - मेरौ लाल कारौ नाँहि, स्वर्ण-वर्ण वारौ है

 ऐसौ भव्य-दिव्य और ऐसौ ओजस्वी स्वरूप,
जाकी प्रभुता कौ कन-कन पै इजारौ है 
 
जाके अंग-अंग सूर्यचन्द्रमाअकास-गंग,
जाकी ज्योत्सना कौ ठौर-ठौर उजियारौ है 

सवैया छन्द

 मन की सुन के मन मीत बने, तब कैसे कहूँ तुम हो बहरे ।
पर बात का उत्तर देते नहीं, यही बात हिया हलकान करे ।

छन्द - श्री मद्भगवद्गीता

 हर तत्व पै विमर्श हर प्रश्न का उत्तर
जिसने बता के बुद्धिजीवियों को जीता है ।
 
कण-कण में शिव के दरस कराने वाला
जिसके समक्ष कुछ भरा है न रीता है ।

छन्द - नन्दबाबा ने विलाप क्यों नहीं किया

 जब सों वौ नंदलाल छोड़ कें गयौ है हमें
क्रूर विधिना नें सुख सतत हर्यौ है री
 
अमृत चखाय फिर बिस में डुबोय डार्यौ
जानें ऐसौ पाप कहा हमनें कर्यौ है री

झुला एवं वर्षा ऋतू छन्द

 नेह की नगरिया में वेद  विधान कोऊ,
प्रीत के पखेरु कौ पंथ भावभीनौ है।
 
पाये बिनु चैन नहीं पाय कें हू चैन नहीं,
तृषा और तृपती में भेद अति झीनौ है 

फूल बँगला छन्द

 साँवरौ-सलौनों नन्द-जसुधा कौ प्राणप्यारौ,
नैनन कौ तारौ मन्द-मन्द मुसकावै है ।
 
सृष्टि कौ रचैया बलभद्र जू कौ भैया श्याम,
भक्तन के भक्तिभाव देखि कें सिहावै है ।

छन्द - कन्हैया ने नन्दबाबा का रूप धरा

 पीरी बगलबन्दी पै गैया के खुर’न जैसे
केसरिया छापे’न की सोभा सुन्दर ललाम
 
काँधे पै धर्यौ है खेस सीस पै कसी है पाग
बाँसुरी कों छाँडि आज लठ्ठ कों लियौ है थाम

छन्द - प्रेम-रस भीने नैन नैन’न समाये हैं

 गोटा औ किनारी वारे बैंजनिया झगला पै
सिलमा सितारे’न के फूल कढवाये हैं
 
पोंहचे कलाइ’न में पाँय’न में पैजनियाँ
कर्णफूल मानों पूर्ण चन्द्रमा बिठाये हैं

छन्द - कन्हैया जैसा कोई नहीं

 ठौर में ठौर तू हीतौर में तौर तू ही,
पौर में पौर तू हीबौर में बौर है 
 
फाग में फाग तू हीबाग में बाग तू ही,
राग में राग तू ही साँचौ सिरमौर है