मन में उमंग भरि मिलवे जो आवै जीव,
अपनी अ-देखी देख और ठौर पै न जाय ।
काया की कबूतरी के मोह सों जो छूट गयौ,
ता कों भरमाय माया खेंच फिर लै न जाय ।
सन्मुख जो देखियै तौ सन्मुख ही दीख पावै,
सन्मुख ही देखवे सों दृष्टि दास पै न जाय ।
तब ही तौ द्वारकेश चरण बिलोकत हैं,
भूल कें हूँ भक्त’न की अनदेखी है न जाय ।।
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