छन्द - राजाधिराज द्वारिकाधीश

 मन में उमंग भरि मिलवे जो आवै जीव,
अपनी -देखी देख और ठौर पै  जाय 
 
काया की कबूतरी के मोह सों जो छूट गयौ,
ता कों भरमाय माया खेंच फिर लै  जाय ।
 
सन्मुख जो देखियै तौ सन्मुख ही दीख पावै,
सन्मुख ही देखवे सों दृष्टि दास पै  जाय ।
 
तब ही तौ द्वारकेश चरण बिलोकत हैं,
भूल कें हूँ भक्त की अनदेखी है  जाय ।।

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