भजन कीर्तन - घरबार भी तुम्हीं हो दरबार भी तुम्हीं हो

 मिसरी की डलियों को कुतरा नहीं जाता है
रस चख तो सकते हैं खाया नहीं जाता हैं
इस खातिर ही तो हम तुझे ढूँढते रहते हैं
हासिल में तलब का मज़ा पाया नहीं जाता है
 
घरबार भी तुम्हीं हो दरबार भी तुम्हीं हो
मेरे दिल की सल्तनत की सरकार भी तुम्हीं हो
 
नयनों के रास्ते से दिल में उतर गये तुम
कस्तूरी की तरह फिर मुझ में बिखर गये तुम
तुम ही चमन के माली गुलजार भी तुम्हीं हो
 
आँखों में छब तुम्हारी लब नाम रट रहे हैं
मस्ती में मेरे मोहन दिनरात कट रहे हैं
तुम ही हो पीर मन की उपचार भी तुम्हीं हो
 
सच कह रहा हूँ प्यारे कुछ भी कमी नहीं है
वो ही नहीं मिला है जो लाजिमी नहीं है
तुम ही मेरे खिवैया पतवार भी तुम्हीं हो
 
नादान हैं वो तुमको हरदिन परख रहे हैं
और नित नवीन बाँकी झाँकी निरख रहे हैं
उस पार ही नहीं तुम इस पार भी तुम्हीं हो

No comments:

Post a Comment