श्याम सुन्दर श्री यमुने महारानी जू के छन्द

 पावन पुनीत धरा धाम गुप्त स्रोत’न सों,
अंकुर उलीच हरियाली बिकसामें हैं ।
 
खेत’न कों धान दै कें कूप’न कों नीर दै कें,
मेघ’न कों भाप दै कें जीविका चलामें हैं ।
 
नित्य ही नवीन निज संतति इच्छानुसार,
ममता लुटाय मातृ-धर्म कों निभामें हैं ।
 
जड़, जीव दौनों’न की क्षुधा, तृषा शान्त करें,
या ही सों आप यमुना मैया कहलामें हैं ।।
 
 
 
घनदामिनी सौ किंतु मुरली सौ मधु-मातौ,
मन्द मृदु-हास करें यमुने महारानी जू
 
रास के रचैया की परम प्रवीण सखी,
विमल विलास करें यमुने महारानी जू
 
नित्य ही नवीन गतिमान दिनमान जैसें,
सहज प्रवास करें यमुने महारानी जू
 
पल-पल छिन-छिन कृष्ण कृष्ण गात भये,
सदा ब्रजवास करें यमुने महारानी जू ।।
 
 
 
सरल सुभाउ वारी विमल प्रभाउ वारी,
टारे हू सों न टरें यमुने महारानी जू ।
 
कमल नयन वारी मधुर वचन वारी,
झूम झूम नृत्य करें यमुने महारानी जू ।
 
नित्य ही नवीन बेला, मोंगरा, गुलाब’न की,
कुंज’न में गन्ध भरें यमुने महारानी जू ।
 
नैन’न के तारे हू के प्राण’न की अति प्यारी,
सदा ब्रजवास करें यमुने महारानी जू ।।
 
 
 
गिरिवर कलिन्द सों रति कों लजात भई,
झुक-झुक झूम-झूम दौरी चली आमें हैं ।
 
कूल’न पै फूल’न के झूल’न पै झूल-झूल
प्रीतम सों मिलिवे के सपन सजामें हैं ।
 
नित्य ही नवीन प्रेम-प्रीत सों भरे प्रसंग
नेह-दीप बार, भ्रम-तम कों नसामें हैं ।
 
ज्यों ही वसुदेव पग धारें, त्यों ही भानुसुता
ब्रज-इन्दु कों निहार सिन्धु बन जामें हैं ।।
 
 
 
सहज सनेह भरी सहज गुमान भरी
सहज सिहाय, देख-देख हरसामें हैं ।
 
चित्त में गुविन्द-गीत, बात’न में प्रेम-प्रीत,
देह-यष्टि सों पुनीत-भाव दरसामें हैं ।
 
फूल’न से हाथ’न में अरविन्द गुच्छ लिएँ
नित्य ही नवीन सुधा-सिन्धु सरसामें हैं ।
 
लीला-पुरुसोत्तम की मरयादा के हितार्थ
द्वापर में त्रेता वारौ रस बरसामें हैं ।।
 
 
 
मोहनिया मुरली की मीठी-मीठी तान जैसी
श्याम-वर्ण, शान्त-चित्त वारी श्री यमुना जी
 
रसिक शिरोमणि के रंग रँगी सहचरी,
सदा श्याम जू कों शुभकारी श्री यमुना जी
 
नटखट कन्हैया के चरण  पखारिबे कों,
गिरिवर्कलिन्द सों पधारीं श्री यमुना जी
 
सर्व-सुखकारी, दुख-दर्द-कष्ट हारी, नँद-
नन्द जू कों प्यारी हैं हमारी श्री यमुना जी ।।
 
 
 
सूरज की तनया हौ, यम की बहन आप,
माथुर मुनीस की मातु हौ सुहासिनी
 
ब्रजभूमि कों सहर्ष आपनें कृतार्थ कियौ,
श्याम जू की श्यामा प्रेम पुंज की प्रकासिनी
 
चौदह भुवन माँहि आपकौ प्रताप मैया
त्रयलोक मध्य भक्तिभाव की विकासिनी
 
छूटें यम-फन्द, मिटें द्वन्द अनन्द होंय,
आप की कृपा सों श्री यमुने ब्रजवासिनी ।।

No comments:

Post a Comment