नन्दबाबा छन्दमाला

 नन्दबाबा सोचत हैं आज निज-काजन कों,
जैसें बन परै तैसें शीघ्र ही पताय लेंहु ।
 
लक्ष्य साधवे में कहूँ होय ना विलम्ब या सों,
सेवक सों बोल घोड़ागाड़ी हू मँगाय लेंहु ।
 
नित्य-नित्य जसुधा जो लूटत है दोऊ हाथ,
आज क्यों न मैं हू वा लाभ कों उठाय लेंहु ।
 
गउएँ चराय ज्यों ही ऐहै घनश्याम त्यों ही,
प्राणन पियारे कों करेजे सों लगाय लेंहु ।।
 
 
 
नन्दबाबा सोचत हैंमन ही में बोलत हैं,
बाबरी जसोदा तेरौ लालन प्रभा सौ है ।
 
जा कौ पान करिवे कों देवता हू तरसें हैं,
तेरौ प्राण प्यारौ ऐसी उत्तम सुधा सौ है ।
 
याचक बने हैं खड़े जा के द्वार पै कुबेर,
तेरौ यै कन्हैया ऐसी श्रेष्ठ सम्पदा सौ है ।
 
थार में तू जा कों चन्द्र-दरस कराय रही,
चन्द्रमा स्वयं वा के दरस कौ पियासौ है ।।
 
 
 
नन्दबाबा सोचत हैं काहे कों विरुद्ध बहों,
सरिता के संग-संग बहिवौ ही ठीक है ।
 
जसुधा के खीझवे पै कान्हा नें उघार्यौ मुख,
ऐसी लीला कौ तौ लाभ लहिवौ ही ठीक है ।
 
जसुधा निशब्द भयीब्रजजन स्तब्ध भये,
अपनों हू कछू नाँहि कहिवौ ही ठीक है ।
 
लीला पुरुषोत्तम जो लीला दरसाय रहे,
अपनों ऐसे में मौन रहिवौ ही ठीक है ।।
 
 
 
नन्दबाबा मन ही में कन्हैया सों बोलत हैं,
बारी सी उमर तेरी कैसें पतियाओं मैं ।
 
छोटे-छोटे पाँयन ते बरसानें पौंच गयौ,
तेरी करतूत सुन मन में सिहाओं मैं ।
 
भेस कों बदल तैं नें म्हैल में प्रवेश पायौ,
गोरी की कलाई गहीसोच हरसाओं में ।
 
राधा की हथेरिन पै नाम लिख दीनों श्याम,
वा रे लिलिहार तेरी बलिहारी जाओं मैं ।।
 
 
 
नन्दबाबा मन ही में कन्हैया सों बोलत हैं,
तेरी किलकारी हेतु योग बनवाए हैं ।
 
है कें परेसान तेरे माखन चुरायवे सों,
हाट सों जसोमति नें छींके मँगवाए हैं ।
 
किन्तु मैं तौ जानत हों पीठन पै चढ़ कें हू,
काम नाँहि बनिहैसो जतन कराए हैं ।
 
तेरे संग तेरे सखा माखन कों लूट सकें,
यै ही निरधार छींके नीचे टँगवाए हैं ।।
 
 
 
नन्दबाबा मन ही में लोगन सों बोलत हैं,
और मत मानों एक दिन पछताउगे ।
 
रोज उठिवे के बाद कौन कों जगाउगे औ,
सोयवे सों पैलें सोचौ कौन कों सुवाउगे ।
 
इतने उलाहने जो करत रहत हौरे,
रूस-रूस कें हू केते बरस रिसाउगे ।
 
काहू दिन छोड़ कें यै छलिया चलौ गयौ तौ,
चाह कें हू या कों पाछौ लाय नाँहि पाउगे ।।
 
 
 
नन्दबाबा सोचत हैं सरदी में प्राण-प्यारौ,
पानी सों डरपत हैडर कों भगाय देंहु ।
 
सरदी की रुत माँहि मैल और बाढ़त है,
रगड़-रगड़ या के मैल कों छुड़ाय देंहु ।
 
जसुधा कौ करेजौ तौ मैया कौ करेजौ हैसो,
चलौ आज मैं ही पितृ-धर्म कों निभाय देंहु ।
 
गुनगुनौ पानी कर क्यों न स्वयं मैं ही आज,
श्याम-सुन्दर कों मल-मल कें न्हवाय देंहु ।।
 
 
 
नन्दबाबा सोचत हैं कैसौ अद्भुत सुयोग,
सत्य में जो लुप्त है वौ प्रकट साकार है ।
 
मरुथल की सत्ता हैतौ हू निर्झर समान,
हिरदे में बह रही अमृत की धार है ।
 
स्वप्न के समान सब कछ ह्वै रह्यौ घटित,
छिन में नशा चढ़ै है छिन में खुमार है ।
 
सत्य कों बिसार तौ हू यै ही बिचारेंभलें ही,
पूत है परायौ किन्तु जीवन आधार है ।।
 
 
 
सुख कों सहेजनों औ दुख कों बिसार दैनों,
प्रीत के सोपानन पै चढिवौ जरूरी है ।
 
नेह के बदरवा की भाँति मेह-गेह बन,
छोह की मिसालन कौ गढ़िवौ  जरूरी है ।
 
नित्य ही नवीन पीर अमृत कौ पान कर
त्याग-तसवीरन कों मढ़िवौ जरूरी है ।
 
बेटा कौ बिछोह कहा होत हैसमुझिवे कों,
नन्दबाबा की कहानी पढ़िवौ जरूरी है ।।

No comments:

Post a Comment