छन्द - मेरौ लाल कारौ नाँहि, स्वर्ण-वर्ण वारौ है

 ऐसौ भव्य-दिव्य और ऐसौ ओजस्वी स्वरूप,
जाकी प्रभुता कौ कन-कन पै इजारौ है 
 
जाके अंग-अंग सूर्यचन्द्रमाअकास-गंग,
जाकी ज्योत्सना कौ ठौर-ठौर उजियारौ है 
 
नित्य ही नवीन रश्मि-पुंज कों प्रगटावै,
जाके हौल सों हलाल तिमिर बिचारौ है 
 
ऐसे प्रभावन्त कों मैं कैसें कह देंहु कारौ,
मेरौ लाल कारौ नाँहिस्वर्ण-वर्ण वारौ है ।।

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