छन्द - प्रेम-रस भीने नैन नैन’न समाये हैं

 गोटा औ किनारी वारे बैंजनिया झगला पै
सिलमा सितारे’न के फूल कढवाये हैं
 
पोंहचे कलाइ’न में पाँय’न में पैजनियाँ
कर्णफूल मानों पूर्ण चन्द्रमा बिठाये हैं
 
नित्य ही नवीन व्योम गंग धार के समान
मोति’न के हार कण्ठ वक्ष पै धराये हैं
 
देख-देख जियों रस घोर-घोर पियों ऐसे
प्रेम-रस भीने नैन नैन’न समाये हैं

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