छन्द - नन्दबाबा ने विलाप क्यों नहीं किया

 जब सों वौ नंदलाल छोड़ कें गयौ है हमें
क्रूर विधिना नें सुख सतत हर्यौ है री
 
अमृत चखाय फिर बिस में डुबोय डार्यौ
जानें ऐसौ पाप कहा हमनें कर्यौ है री
 
नित्य ही नवीन पीर धीर की परीक्षा लेत
ता पै एक प्रश्न मेरे मन में अर्यौ है री
 
जसुधा की अँखियाँ तौ बरस रही हैं किन्तु
कहा सोच बाबा नें विलाप न कर्यौ है री
 
 
 
प्राण सों प्यारे घनश्याम कौ बिछोह ताप
जब सों मिल्यौ है जीव सतत जर्यौ है री
 
अन्न जल त्याग दीन्हे काम हू बिसार  दीन्हे
नाम रसना सों किन्तु टारें टर्यौ है री
 
नित्य ही नवीन भाँति भाँति बहलाय मन
यै ही निरधार मन धीरज धर्यौ है री
 
कोन है जो जसुधा के हिय की मिटावै पीर
यै ही सोच बाबा नें विलाप न कर्यौ है री

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