बढा रही हैं रंगतें हुजूर के दयार की

 बढा रही हैं रंगतें हुजूर के दयार की ।
उमंग में तरंग घोलती धुनें धमार की ॥
 
निकुंज के सनेहियों को और चाहिये भी क्या ।
वही किशन की बाँसुरी वही धुनें धमार की ॥
 
लता-पताएँ छोड़िये महक तलक उदास है ।
बिछोह में झटक गयी हैं बेटियाँ बहार की ॥
 
इसी लिये तो आप से सनेह छूटता नहीं ।
इक आप ही तो सुनते हैं शिकायतें शिकार की ॥
 
कभी कहो हो सब्र कर कभी कहो हो भूल जा ।
बदल रहे हैं आप क्यों दवाइयाँ बुखार की ॥
 
 कल्प-वृक्ष चाहिये  कामधेनु चाहिये।
हुजूर हम तो चींटियाँ हैं आप के दयार की॥
 
जरूर उन को भी हमारी याद आई है 'नवीन'
तभी तो बात हो रही है नन्द के कुमार की॥

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