सवैया छन्द

 मन की सुन के मन मीत बने, तब कैसे कहूँ तुम हो बहरे ।
पर बात का उत्तर देते नहीं, यही बात हिया हलकान करे ।
सच में तुमको दिखते नहीं क्या, अपने भगतों के बुझे चहरे ।
दिखते हैं तो मौन लगाए हो क्यूँ, हर से कह दो हर पीर हरे ।।
 
 
नव भाँति की भक्ति सुनी तो लगा, इस जैसा जहान में तत्व नहीं ।
जसुधा की कराह सुनी तो लगा, तुमरे दिल में अपनत्व नहीं ।
तुम ही कहिये घन की गति क्या, उस में यदि होय घनत्व नहीं ।
हर बार तुम्हारी ही बात रहे, फिर तो नवधा का महत्व नहीं ।।
 
 
दिन रैन यही दिल बोल रहा, गम क्या उनका जो झिंझोड़ गये ।
हमरा अपराध नहीं कुछ भी, फिर भी सिर ठीकरा फोड़ गये ।
उस राह सिवाय विकल्प नहीं, जिस राह पे मोहन मोड़ गये ।
अब उद्धव बीन बजाओ नहीं, हरि छोड़ गयेदिल तोड़ गये ।।


भ्रमना जब चाल कुचाल चलै, तब गीता कौ ज्ञान प्रदाय करें

जन-जीवन पै कछु भीर परै, उपकार नहीं सदुपाय करें

भलें देर-सबेर करें, पै करें, मनचाह्यौ करें कि सिवाय करें

निज प्रेमि कों बिसरात नहीं, गिरिधारी सदैव सहाय करें ।।

 

 

कबहू कँगना खनकावत हैं, कबहू चुनरी फहरावत हैं ।

कबहू अधरा’न धरें मुरली, कबहू मिरदंग बजावत हैं ।

कबहू लट गूँथत हैं, कबहू उरझी लट कों सुरझावत हैं ।

कर याद निकुंज’न की बतियाँ, मन ही मन में मुसकावत हैं ॥

 

 

पिय की बतियाँ परसें मन त्यों, जो नहीं परसै रस तौ कहियो

जिहिं भाँति खिलें तुलसीदल त्यों, जो नहीं सरसै रस तौ कहियो

रसपान करावन हेतु स्वयं, जो नहीं तरसै रस तौ कहियो

रसिकेश-प्रिया जू कौ ध्यान धरौ, जो नहीं बरसै रस तौ कहियो

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