मिथिलापुर की नारी
रंग खेलने अवधपुरी में,
आई हैं हुरियारी
छेड़ रही हैं दशरथ जी को
लीला है अति न्यारी
दशरथ जी अपनी चौथी
पतनी से भेंट काराओ
उसने कितने लाल जने हैं,
सही-सही बतलाओ
जनकपुरी में और भी कन्या,
बैठी हुई हैं क्वारी
दशरथ बोले इन तीनों नें,
तीन लोक दिखलाए
चौथी कर के मरते क्या हम,
कहि के तनिक मुसकाए
छेड़ो हो तो तुम भी सुनो
हम, तुम पर हैं बलिहारी
वे बोलीं समधी जू तुमरे,
हिरन, हिरन हो गए हैं
ये बोले समधिन जू हम तो
रस का रस ले रए हैं
नित-नवीन परिहास देख कर
छेड़ रही हैं दशरथ जी को
लीला है अति न्यारी
दशरथ जी अपनी चौथी
पतनी से भेंट काराओ
उसने कितने लाल जने हैं,
जनकपुरी में और भी कन्या,
दशरथ बोले इन तीनों नें,
चौथी कर के मरते क्या हम,
छेड़ो हो तो तुम भी सुनो
हम, तुम पर हैं बलिहारी
वे बोलीं समधी जू तुमरे,
ये बोले समधिन जू हम तो
रस का रस ले रए हैं
नित-नवीन परिहास देख कर
मगन हैं अवध बिहारी
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