दोहे - राधा और कृष्ण

 कृष्ण
रोम रोम है कह रहा छोड़ जगत के काम
बुला रहा है साँवरा चल वृन्दावन धाम
 
दुनिया कैसी बावरी कान्हा कों भरमाय
लडुआ वाय दिखाय कें खुद्द हड़प कर जाय
 
श्यामल तन पै श्याम के आभूषण अतिरेक
यों लागै आकास में चमकें चन्द्र अनेक
 
चाखन बरजोरी करै आँख’न सों बरजोर
लाख’न कों बाँटत फिरै माखन माखनचोर
 
नैना ऐसे लालची सन्द सन्द कर बन्द
मन्द मन्द मुस्कान कौ लूट रहे आनन्द
 
निमिष निमिष निरखें नयन दरस नयन अभिराम
नाच रही हैं गोपियाँ नचा रहे घनश्याम
 
रासबिहारी पर भला कौन नहीं बलिहार
हम साधारण जीव हैं नार बने त्रिपुरार
 
जिसकी जैसी भावना वैसा देगा नाम
अपनी प्रीत पवित्र है मैं मीरा तुम श्याम
 
ऐसी प्रीत नहीं दिखी देखीं प्रीत अनेक
नैन भलें जल थल रहे अश्रु बह्यौ नहिं एक
 
सब स्याने हैं बावरे स्याने श्यामा श्याम
एक प्राण दो देह सों लीला करीं तमाम
 
काम रहित तो हो नहीं फिर भी हो निष्काम
हे परमातम आपको आतम करे प्रणाम
 
घर घर जसुमति आज भी लड़ा रही हैं लाड़
पहुँच गये कब के मगर कृष्ण काठियावाड़
 
राधा
सरसाने को राधिका हरसाने के गीत
बरसाने में ही रही बरसाने को प्रीत
 
रूठ गयी हैं राधिका कान्हा रहे मनाय
केती हू ना ना करै हाँ हाँ परै सुनाय
 
मनमीतों से कब छुपा मनमीतों का हाल
राधे को मालूम है सब के हैं नंदलाल

नारायण नारायणी
 सदा सच्चिदानन्द मय करता नहीं गुमान

नर नारायण है वही जो है दयानिधान

 

ओछे स्वारथ के लिए नहीं खेलती दाँव

वह नारी नारायणी जो ममता की छाँव

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