बड़ी मिठास भरे रस को पी के आया हूँ ।
नज़र में भर के दरस लाडली के
आया हूँ ।।
गया था मैं भी वहाँ ज्ञान का
वमन करने ।
मुहब्बतों के समझ कर सलीक़े आया हूँ ॥
वो एक पल जो परम-ध्यान में बिताया था ।
उस एक पल में कई जन्म जी के आया हूँ ।।
सभी के सामने अब सर नहीं
झुकाऊँगा ।
नवा के शीश भवन में लली के आया हूँ ।।
दवा तो जिस्म के रोगों को
ठीक करती है ।
लिहाज़ा रूह पै लगवा के टीके आया हूँ ।।
नये उजाले धुएँ भर रहे थे
आँखों में ।
सो मैं जला के दिये शुद्ध घी के आया हूँ ।।
मुहब्बतों के समझ कर सलीक़े आया हूँ ॥
उस एक पल में कई जन्म जी के आया हूँ ।।
नवा के शीश भवन में लली के आया हूँ ।।
लिहाज़ा रूह पै लगवा के टीके आया हूँ ।।
सो मैं जला के दिये शुद्ध घी के आया हूँ ।।
No comments:
Post a Comment