पल-भर, भर जो भाव सों, नैन बन्द कर लेंय।
सेवा में गुरुदेव जू, आज’हु दरसन देंय।।
सरल-चित्त, करुणा-अयन, भेद न हृदय निमेष।
सब परिहरि, हरि कों भजें, गुरुवर श्री विट्ठलेश।।
मस्तक अरु भुजदण्ड पै, केशर-चन्दन खौर।
लाड़ लडामें लाल के, भक्तन के सिरमौर।।
जमना सों जल लाय कें, कनुआ कों अन्हवात।
चरणामृत कों सिद्ध कर, अमरित पान करात।।
करी आप के संग जो, भक्ति-भाव में खोय।
ऐसी ब्रजयात्रा, अहा! भई कबू न होय।।
जो हू ड्यौढ़ी पै चढ़ै, बन ही जाय प्रबुद्ध।
मन्तर पढ कें कान में, करें जीव कों शुद्ध।।
बड़े-बड़े विद्वान हू, महिमा कहें अनन्त।
रहे गृहस्थी में, तऊ, बने विलक्षण-सन्त।।
घर-घर में गोपाल की, छवि है जो आसीन।
सरल-चित्त, करुणा-अयन, भेद न हृदय निमेष।
सब परिहरि, हरि कों भजें, गुरुवर श्री विट्ठलेश।।
मस्तक अरु भुजदण्ड पै, केशर-चन्दन खौर।
लाड़ लडामें लाल के, भक्तन के सिरमौर।।
जमना सों जल लाय कें, कनुआ कों अन्हवात।
चरणामृत कों सिद्ध कर, अमरित पान करात।।
करी आप के संग जो, भक्ति-भाव में खोय।
ऐसी ब्रजयात्रा, अहा! भई कबू न होय।।
जो हू ड्यौढ़ी पै चढ़ै, बन ही जाय प्रबुद्ध।
मन्तर पढ कें कान में, करें जीव कों शुद्ध।।
बड़े-बड़े विद्वान हू, महिमा कहें अनन्त।
रहे गृहस्थी में, तऊ, बने विलक्षण-सन्त।।
घर-घर में गोपाल की, छवि है जो आसीन।
भरी आप के भाव सों, नित-नित लगै नवीन।।
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