श्री श्री 1008 श्री विठ्ठलेश जी महाराज दोहा अष्टक

पल-भर, भर जो भाव सों, नैन बन्द कर लेंय।
सेवा में गुरुदेव जू, आजहु दरसन देंय।।
 
सरल-चित्त, करुणा-अयन, भेद न हृदय निमेष।
सब परिहरि, हरि कों भजें, गुरुवर श्री विट्ठलेश।।
 
मस्तक अरु भुजदण्ड पै, केशर-चन्दन खौर।
लाड़ लडामें लाल के, भक्तन के सिरमौर।।
 
जमना सों जल लाय कें, कनुआ कों अन्हवात।
चरणामृत कों सिद्ध कर, अमरित पान करात।।
 
करी आप के संग जो, भक्ति-भाव में खोय।
ऐसी ब्रजयात्रा, अहा! भई कबू होय।।
 
जो हू ड्यौढ़ी पै चढ़ै, बन ही जाय प्रबुद्ध।
मन्तर पढ कें कान में, करें जीव कों शुद्ध।।
 
बड़े-बड़े विद्वान हू, महिमा कहें अनन्त।
रहे गृहस्थी में, तऊ, बने विलक्षण-सन्त।।
 
घर-घर में गोपाल की, छवि है जो आसीन।

भरी आप के भाव सों, नित-नित लगै नवीन।।

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