छन्द - कन्हैया ने नन्दबाबा का रूप धरा

 पीरी बगलबन्दी पै गैया के खुर’न जैसे
केसरिया छापे’न की सोभा सुन्दर ललाम
 
काँधे पै धर्यौ है खेस सीस पै कसी है पाग
बाँसुरी कों छाँडि आज लठ्ठ कों लियौ है थाम
 
नित्य ही नवीन भेस धरिवे कौ अनुरागी
बैठका में बैठ चाकर’न सों करावै काम
 
ऐसे रूप कों निहार जसुधा पलोटी जात
चों कि आज नन्दबाबा बनि कें बैठ्यौ है श्याम

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