झुला एवं वर्षा ऋतू छन्द

 नेह की नगरिया में वेद  विधान कोऊ,
प्रीत के पखेरु कौ पंथ भावभीनौ है।
 
पाये बिनु चैन नहीं पाय कें हू चैन नहीं,
तृषा और तृपती में भेद अति झीनौ है 
 
सावन के महीना में बरखा की बूँद नें,
डार-डार पात-पात प्रेम लिख दीनौ है 
 
देर न लगाहु अब झूलन पधारौ बेगि,
लाडले जू लाडली नें झूला डार लीनौ है ।।
 
 
 
ग्रीसम की गरमी हू जा कों नहिं छीन पाई,
बरखा की बूँद' नें धीरज वौ छीनों है 
 
मेघ के स्वागत में बहती बयार नें,
जोगन कौ जीवौ और दुसवार कीनों है 
 
नित्य ही नवीन अनुराग के पराग पगी,
परम आल्हादिनी नें यही प्रण लीनों है 
 
एक ही लगी है रट भलें प्यासी मर जाहुँ,
अमृत पीनों तौ बस आप संग पीनों है 
 
 
 
झूले परकें हू, तभू, महके अतर फुलेल
लेकिन अबकी बार तौ खुल कें खेले खेल
खुल कें खेले खेल दोउ मनमीत हमारे
दोऊ चतुर प्रवीन दोउ प्राण’न सों प्यारे
गलबहिय’न कों डार खुसी में ऐसे फूले
सावन में आरम्भ कियौ फागुन तक झूले
 
 
 
ए हो घन श्याम घनश्याम से न कीजै काम
दुखियारी कों दुखाय काहें हरसात हौ
 
ऋतुराज काल जैसें सरसों सरसावै है
विरह वसुन्धरा पै काहें सरसात हौ
 
नित्य ही नवीन दिवा स्वप्न दरसाय प्यारे
सारी सारी रैन मोहि काहें तरसात हौ
 
अम्बर विहारी तुम अम्बर सों बरसौ रे
मेरे नैन’न सों नीर काहें बरसात हौ

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