भगतों के लिये यदि राम जी कँवल हैं तो,
राम जी के लिये मकरन्द हनुमान हैं ।
भगतों के लिये यदि राम जी समुद्र हैं तो,
राम जी के लिये तटबन्ध हनुमान हैं ।
नित्य ही नवीन ये जो राम जी की बगिया है,
इसकी सुहावनी सुगन्ध हनुमान हैं ।
भगतों की पहली पसन्द भले राम जी हों,
राम जी की पहली पसन्द हनुमान हैं ॥
राम-राम-राम बस राम-राम, राम-राम,
जिस में लिखा है वो निबन्ध हनुमान हैं ।
जहाँ जहाँ गये वहीं राम जी
के गुण गाये,
सूरज हैं राम जी तो चंद हनुमान हैं ।
नित्य ही नवीन लगे ऐसे रंग
में अभंग,
शब्द-शब्द राम छन्द-छन्द हनुमान हैं ।
यों तो राम जी को सारा जग है पसन्द किन्तु,
उस में भी पहली-पसन्द हनुमान हैं ॥
किषकिन्धा-रत्न-श्रेष्ठ, मत्स्य-नाथ, भद्र-रुद्र,
आंजनेय, वायुपुत्र भक्तों का भला कीजै ।
अक्षय कुमार हन्ता, बलवन्ता, हनुमन्ता,
गुणग्राही, गुणवन्ता, दीनों पै दया कीजै ।
नित्य ही नवीन भोग विषयों
में डूब कर
भटक रहे हैं हम हमको क्षमा कीजै ।
हमारी दशा भी प्रभु विभीषण
के जैसी है,
हमारी भी राम जी से मित्रता
करा दीजै ।।
या तो द्रोण पर्वत या पर्वत
की घास पूस,
कंकर पत्थर पौधा कुछ भी बना दीजै ।
भील राज केवट या शबरी या
स्वर्ण-मृग
वानर या भालू जैसी कुछ भी धजा दीजै ।
आप की महर से तो लंकिनी भी
तर गयी,
एक बार हम पै भी कुछ तो कृपा
कीजै ।
आशा भरे नयनों की ये ही
अभिलाषा है कि,
हमको भी राम जी के दर्शन करा
दीजै ।।
शम्भु के सपूत आप, अंजनी के लाल आप,
केशरी-समीर-पुत्र, मत्स्य-नाथ रीझियै ।
धन्य इन्द्रजीत-जीत-शेष
के विशेष-मीत,
लंकराज-बन्धु-मित्र, नैंकु तौ पसीजियै ।
नित्य ही नवीन राम के सनेह
में प्रवीण,
भक्त-वृन्द पै प्रभु कृपा-कटाक्ष कीजियै ।
युद्धभूमि में कराल, प्रीत पन्थ के मराल,
काल हू के काल, ब्याल-जाल
काट दीजियै ॥
जिस में लिखा है वो निबन्ध हनुमान हैं ।
आंजनेय, वायुपुत्र भक्तों का भला कीजै ।
भटक रहे हैं हम हमको क्षमा कीजै ।
कंकर पत्थर पौधा कुछ भी बना दीजै ।
वानर या भालू जैसी कुछ भी धजा दीजै ।
केशरी-समीर-पुत्र, मत्स्य-नाथ रीझियै ।
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