पद - सन्त जन / कृष्ण / राधा / यमुना / ब्रज रज

ब्रज रज कन बन जैयै
श्यामाश्याम चरन कमल’न सों, लिपट लिपट हरसैयै
 
यमुना पुलिन पवन के रथ पै, उड़त फिरत इतरैयै
कुंज निकुंज’न, कूल, कछार’न, द्रुमदल छैंय’न छैयै
 
कर बिनु कर कमल’न सों गहि कें, मुख बिनु माखन खैयै
पग बिनु पग-पग नृत्य करत भए दृग बिनु दरसन पैयै
 
हरिदास’न के दास’न हू के दास’न के गुन गैयै
नित्य नवीन छवी निरखत भए रसिक’न की गति पैयै
 
 
 
सखी री कीरत बलि-बलि जावै
जग-जननी की जननी बनि कें, हरसावै, मुस्कयावै ।।
 
मन ही मन में बात करत है, मुख सों बोल पावै
कमल-सुनयनी कौ मुख चूमै, कोमल चरन दबावै ।।
 
बरसानें पग-पग रस बरसत, गगन सुमन बरसावै
जलतरंग झनकावत है जल, पवन मृदंग बजावै ।।
 
नित नवीन दरसन परसन कर, हरस-हरस गुन गावै
मुक्ति दायिनी ब्रज की रज हू, अपने भाग सिहावै ।।
 
 
 
सहज सदा अनुकूल श्री राधे सहज सदा अनुकूल
-सहज लाल की सहज लाडली, सकल रस’न की मूल
 
सहज कृपा कर निकट बुलावत, सहज ही करत कबूल
-सहज पन्थ’न के सूल’न कों, सहज करत हैं फूल
 
नित्य नवीन यही वर माँगत, सकल प्रपञ्च’न भूल
जनम-जनम ब्रज बसिवौ दीजै, कालिन्दी के कूल
 
 
 
 कन्हैया जो कछु है सो तेरौ
बिन्दु सों लै कें अगम सिन्धु लों कछु भी नहीं है मेरौ
जब लों मैं मैं करत है मनुआ पावै कष्ट घनेरौ
तेरी दया की जोत जरत ही पल में मिटै अँधेरौ
 
नित्य नवीन जगत फन्द कौ तू ही करत निबेरौ
अब
अब तू ही कछ ऐसौ कर जो बेगि होय पग फेरौ
 
 
जय हो नन्दकुमार
तुम अद्भुत हौ और तुम्हारी लीला अपरम्पार
 
बिस कौ पान करावन आयी इक मायावी  नार
करुणा कर वा हू कौ तुम नें कर दीनों उद्धार
 
कुब्जा, कुन्ती, द्रौपदि के तुम कष्ट निवारन हार
किन्तु यशोदा के नैन’न सों रुकत नहीं जलधार
 
सतयुग त्रेता द्वापर में तौ खूब लये अवतार
नित्य नवीन असुर दल बाढ़त कब अइहौ सरकार
 
 
कुंज निकुंज’न अनुरागी
तुम संग रास रचाय कें हमरी, सोई बिधिना जागी
 
तीनों लोक’न में हम जैसौ, कोउ नहीं बड़भागी
हमनें नारी रूप में देखे, शंकर से बैरागी
 
नित्य नवीन कथा हैं तुम्हारी, विविध रस’न में पागी
तुम जैसौ भोगी नहिं देख्यौ, ना ही तुम सौ त्यागी
 
 
रसिक कों यमुना-जल चैंयें ।
यमुना मैया के कूल’न पै, पल पल कल कल चैंयें ।।
 
कल्पवृक्ष नहिं, कामधेनु नहिं, ना ही दल-बल चैंयें ।
श्यामा जू के प्रेमिन कों बस, धारा निरमल चैंयें ।।
 
ना ही केसर नहिं कस्तूरी, नहिं मलयाचल चैंयें ।
नित्य नवीन लगै बस ऐसौ अमरित सौ जल चैंयें ।।

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