भजन कीर्तन - प्रेम के रस में डूबौ रसागार है

 प्रेम के रस में डूबौ रसागार है
रस निकुंज में राधे कौ दरबार है
देह के गेह में नेह के मेह सौ
प्राण प्यारौ ही बस प्राण आधार है
 
ताल हू राधिका थाप हू राधिका
राधिका ही पखावज की चटकार है
राधिका बाँसुरी में बसी माधुरी
राधेरानी ही झाँझन की झनकार है
 
भक्ति ही भक्ति ही भक्ति ही भक्ति ही
यै ही साकार यै ही निराकार है
प्रेम ही दीजियै प्रेम ही लीजियै
या सों बढ़ कें नहीं कोऊ ब्यौहार है

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