कोई जोगन बगैर साजन के,
शम्म की तर्ह जल रही होगी ।
यह तो लोबान जैसी खुशबू है,
कोई मीरा पिघल रही होगी ॥
सिर्फ इक माँ की तर्ह सोचें तो,
साफ पानी की तर्ह दिखता है ।
माँ यशोदा ही बस उदास न थी,
देवकी भी विकल रही होगी ॥
गोपियाँ तो दया की मूरत थीं,
बद्दुआ कैसे देतीं गिरिधर को ।
जानती थीं रुलाया है जिसने,
रूह उस की भी गल रही होगी ॥
रूप धर धर के गोपियाँ अब भी,
कुंजगलियों में ये ही गाती
हैं ।
क्या तुम उस वक्त मिलने आओगे,
साँस जब घर बदल रही होगी ॥
यह तो लोबान जैसी खुशबू है,
माँ यशोदा ही बस उदास न थी,
जानती थीं रुलाया है जिसने,
क्या तुम उस वक्त मिलने आओगे,
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