रसिक-शिरोमणि-धाम के, साँचे-सेवादार ।
पल-पल सिमरुँ आप को, नमन करूँ सरकार ।।
गो-रस-रसिक-प्रिया-रसिक, वृन्दा-विपिन-विहार ।
ब्रज-रज-कण-मणि के धनी, कृपा करो सरकार ।।
मूढ़ समझ सकते नहीं, गूढ़ तत्व का सार ।
आप अगम हैं, आपकी, लीला अपरम्पार ।।
प्रीत भरे पीयूष के, पान करावन हार ।
मम हिय घट में भी भरो, अमरित रस की धार ।।
कृपानाथ निज दास की, अरज करो स्वीकार ।
मन-भ्रमना को भेद कर, कर दो बेड़ा पार ।।
ब्रज-रज-कण-मणि के धनी, कृपा करो सरकार ।।
आप अगम हैं, आपकी, लीला अपरम्पार ।।
मम हिय घट में भी भरो, अमरित रस की धार ।।
मन-भ्रमना को भेद कर, कर दो बेड़ा पार ।।
No comments:
Post a Comment