ठौर’न में ठौर तू ही, तौर’न में तौर तू ही,
पौर’न में पौर तू ही, बौर’न में बौर है ।
फाग’न में फाग तू ही, बाग’न में बाग तू ही,
राग’न में राग तू ही साँचौ सिरमौर है ।
तू ही ढप, ढोल, चंग, तू सितार, तू मृदंग,
तू ही वेणु, तू ही रेणु, तू ही गुल-भौर है ।
नित्य ही नवीन लागै ऐसौ सुन्दर स्वरूप,
तेरी सौंह प्राणप्यारे दूजौ नहिं और है ।।
No comments:
Post a Comment