महीना पच्चीस दिन दूध-घी उड़ामें और
जाय कें अखाडें दण्ड-बैठक लगामें हैं ।
मूछ'न पे ताव दै कें जंघ'न पे ताल दै कें
नुक्कड़-अथाँइ'न पे गाल हू बजामें हैं ।
पिछले बरस बारौ बदलौ चुकायवे कों,
मत पूछौ कैसी-कैसी योजना बनामें हैं ।
लेकिन बिचारे बीर बरसाने पौंचते ही,
लट्ठ खाय गोपि'न सों घर लौट आमें हैं ॥
होरी खेलिवे कों हुरियार चले
बरसानें
बन्दर से कूदें और हुल्लड़ मचामें हैं
टेसू वारे फूल’न कों पानी
में भिंजोय, फिर
भर-भर पिचकारी रंग हू उडामें हैं
पकर पकर सब गोपि’न कों गोबर
के
हौज में डुबोय दिंगे, योजना बनामें हैं
लेकिन बिचारे बीर बरसाने पौंचते ही,
लट्ठ खाय गोपि'न सों घर लौट आमें हैं
मस्त-मस्त मदभरे फाग’न की तान छेड़,
रितुपति वसंत नें म्हैफिल जमाई है ।
रंग’न कौ संग पाय मन की उमंग’न नें,
चंग-ढप-ढोल संग रंगत बढाई है ।
लेकिन रँगरेज कों रंग’न कौ कहा मोह,
हरि नें होरी 'नवीन' रीति सों मनाई है ।
अधर, कपोल, नाक, ठुड्डी, अँगुरिय’न पै,
मीत नें मलाई रुच-रुच कें लगाई है ॥
जसुधा कौ मन भयौ लाल कों भिगोय डारों,
फिर वा कों ध्यान आयौ गजब है जावैगौ ।
रंग डारिवे सों यदि कन्हैया
रिसाय गयौ,
कौन फिर माखन के मीत कों
मनावैगौ ।
नन्दबाबा पूछत हैं ऐ री
जसोमति बोल,
रंग डारिवे सों कान्हा काहे
कों रिसावैगौ ।
जसुधा बोली अहो रँगे भये
हाथ’न सों,
माखन मलाई लाला कैसें चाख
पावैगौ ।।
सुनों री ब्रजांगनाऔ! मन की निकार लेउ,
पूरी छूट दै रही हों नैंकू न विचारियो ।
कारे-कट्ट कों भलें ही गोरौ-घट्ट कर दीजो,
जहाँ जैसें चाहौ वैसें
चीतियो, बिगारियो ।
नित्य ही नवीन रंग डारियो
भलें ही किन्तु,
मेरी एक बात भूलि कें हूँ न
बिसारियो ।
लाला अँगुरिय’न सों नवनीत
चाखत है,
भूलि कें हू हाथ’न पै रंग
नहिं डारियो ।।
कहूँ-कहूँ केसरिया, कहूँ-कहूँ आसमानी,
तौ कहुँ गुलाबी रंग रंगत बढ़ावै है ।
लाल पीरौ सुरमई बैंजनी अरु
कत्थई,
तोतई, बदामी, हरौ हीय हुलसावै है ।
नित्य ही नवीन या के दरस करों हों किन्तु,
होरी में अनोखी भाव-भंगिमा बनावै है ।
झुकि-झुकि झूम-झूम
नन्द कौ त्रिभंगी लाल,
इन्द्र के धनुष जैसी छटा
दरसावै है ।।
नित्य ही नवीन लागै ऐसी शास्वत पिरीत,
मिसरी की डली मानों केसर में बोरी है ।
ऐसी प्रीत के पुनीत रंग’न में सराबोर,
जसुधा कौ छोरा और कीरत की छोरी है ।
लाडले जू लाडली कों लाड’न
लडाय रहे,
छिन में सनेह भाव, छिन जोराजोरी है ।
दुनिया तौ एक होरी खेलि कें
बौराई जाय,
श्यामा-श्याम के यहाँ तौ बारों मास होरी है ॥
नुक्कड़-अथाँइ'न पे गाल हू बजामें हैं ।
बन्दर से कूदें और हुल्लड़ मचामें हैं
भर-भर पिचकारी रंग हू उडामें हैं
हौज में डुबोय दिंगे, योजना बनामें हैं
रितुपति वसंत नें म्हैफिल जमाई है ।
फिर वा कों ध्यान आयौ गजब है जावैगौ ।
पूरी छूट दै रही हों नैंकू न विचारियो ।
तौ कहुँ गुलाबी रंग रंगत बढ़ावै है ।
मिसरी की डली मानों केसर में बोरी है ।
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