उसका ही आसरा था उसका ही आसरा है
सबकुछ मेरे लिए तो नँदलाल
साँवरा है
नयनों के जल से जिसने पग मित्र के पखारे
दही दूध और माखन लगते हैं जिसको प्यारे
अमरित समान जिसकी बानी में रस भरा है
उसका ही आसरा था उसका ही आसरा है
कुब्जा को अप्सरा सा सुन्दर बनाया जिसने
द्रौपद-सुता का गौरव पल-पल बढ़ाया जिसने
जिसका हृदय सभी के दुख-दर्द से हरा है
उसका ही आसरा था उसका ही आसरा है
यमुना की लहरें जिसका रस्ता निहारती हैं
कुंज और निकुंजें जिसको पल-पल पुकारती हैं
जिसके विरह में व्याकुल सारी वसुन्धरा है
उसका ही आसरा था उसका ही आसरा है
जैसा भी जी में आये वैसा वताओ उसको
सच्चा कहो उसे या झूठा बताओ उसको
मेरी नजर में तो वो खोटा नहीं खरा है
सहता है भले विषदंश स्वयं पर लोगों के प्राण बचाता है जो
अनुराग सिवाय विकल्प नहीं मुरली की धुनों में सुनाता है जो
इकमात्र वही मनमीत मेरा नवनीत का स्वाद चखाता है जो
उसका ही आसरा था उसका ही आसरा है .......
नित सावन की बरखा की तर: रस के बदरा बरसाता है जो
अरु फागुन के फगुआ की तर: दिनरात गुलाल उड़ाता है जो
कमनीय सुगन्ध भरी कलियाँ भँवरों के लिए चटखाता है जो
मेरे प्राण निछावर हैं उस पै मेरी साँसों के तार बजाता है जो
उसका ही आसरा था उसका ही आसरा है .......
मथुरा का महीप नहीं बनता जल मध्य ध्वजा फहराता है जो
दिनरात सनेह की बात करे पर युद्ध में शंख बजाता है जो
वन आग लगे तो बुझाए उसे मन की नहीं आग बुझाता है जो
इन नैनों से कैसे निकालूँ उसे इन नैनों की जोत बढ़ाता है जो
उसका ही आसरा था उसका ही आसरा है .......
रस की कुछ बूँदों की चाहत में सरताजों के नाज उठाता है जो
मन की बगिया महकाए सदा फिर भी छलिया कहलाता है जो
तन को तृण मात्र छुए बिनु भी अधरामृत पान कराता है जो
वही यार मेरा दिलदार मेरा तड़पा के भी मौज कराता है जो
उसका ही आसरा था उसका ही आसरा है .......
नयनों के जल से जिसने पग मित्र के पखारे
दही दूध और माखन लगते हैं जिसको प्यारे
अमरित समान जिसकी बानी में रस भरा है
उसका ही आसरा था उसका ही आसरा है
कुब्जा को अप्सरा सा सुन्दर बनाया जिसने
द्रौपद-सुता का गौरव पल-पल बढ़ाया जिसने
जिसका हृदय सभी के दुख-दर्द से हरा है
उसका ही आसरा था उसका ही आसरा है
यमुना की लहरें जिसका रस्ता निहारती हैं
कुंज और निकुंजें जिसको पल-पल पुकारती हैं
जिसके विरह में व्याकुल सारी वसुन्धरा है
उसका ही आसरा था उसका ही आसरा है
जैसा भी जी में आये वैसा वताओ उसको
सच्चा कहो उसे या झूठा बताओ उसको
मेरी नजर में तो वो खोटा नहीं खरा है
सहता है भले विषदंश स्वयं पर लोगों के प्राण बचाता है जो
अनुराग सिवाय विकल्प नहीं मुरली की धुनों में सुनाता है जो
इकमात्र वही मनमीत मेरा नवनीत का स्वाद चखाता है जो
उसका ही आसरा था उसका ही आसरा है .......
नित सावन की बरखा की तर: रस के बदरा बरसाता है जो
अरु फागुन के फगुआ की तर: दिनरात गुलाल उड़ाता है जो
कमनीय सुगन्ध भरी कलियाँ भँवरों के लिए चटखाता है जो
मेरे प्राण निछावर हैं उस पै मेरी साँसों के तार बजाता है जो
उसका ही आसरा था उसका ही आसरा है .......
मथुरा का महीप नहीं बनता जल मध्य ध्वजा फहराता है जो
दिनरात सनेह की बात करे पर युद्ध में शंख बजाता है जो
वन आग लगे तो बुझाए उसे मन की नहीं आग बुझाता है जो
इन नैनों से कैसे निकालूँ उसे इन नैनों की जोत बढ़ाता है जो
उसका ही आसरा था उसका ही आसरा है .......
रस की कुछ बूँदों की चाहत में सरताजों के नाज उठाता है जो
मन की बगिया महकाए सदा फिर भी छलिया कहलाता है जो
तन को तृण मात्र छुए बिनु भी अधरामृत पान कराता है जो
वही यार मेरा दिलदार मेरा तड़पा के भी मौज कराता है जो
उसका ही आसरा था उसका ही आसरा है .......
उसका ही आसरा था उसका ही
आसरा है
कहलाता है चोर भले ही स्वयं पर कैद से मुक्त कराता है जो
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